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थकान के बाद जिस तरह एक कप चाय का मजा कुछ अलग होता है, उसी तरह थकी जिंदगी में ताजगी लगाने के लिए पीयूष मिश्रा की लिखी लाइनें चाय की चुस्की का काम करती हैं। जिंदगी के जज्बातों को शब्दों में पिरोकर पीयूष जिंदगी की उन उलझनों को सुलझा देते हैं, जिसमें हम जिंदगीभर उलझे रहते हैं।
खैर! शब्दों की खूबसूरती ही यही होती है... जज्बात बनकर दिल में उतर जाना।
आज हम जिंदगी के जज्बातों से लबरेज पीयूष मिश्रा के कुछ ऐसे ही अल्फाज आपके लिए लेकर आए हैं...
जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं... जिंदगी का बोझ हम पर बढ़ता जाता है। पढ़ाई, करियर और सपनों को पूरा करने की चाहत जरूरत बन जाती है, जिसकी जितनी बड़ी ख्वाहिशें उसकी उतनी मुश्किल जिंदगी।
जी बिल्कुल सही... एक इतवार (Sunday) ही तो है जब हम अपनों को समय दे पाते हैं। हफ्ते के वो 6 दिन हम घर से दूर.. अपनों से दूर... बस अपने ख्वाहिशों की कीमत चुकाते हैं।
वो कहते हैं न सुख में सब आपके साथ होते हैं, लेकिन असल में आपका कौन है? ये दुख में दिख जाता है।
जितने भी जतन करने है वो इसी जिंदगी में करने हैं। भूख-प्यास की दौड़ में खतरा केवल जिंदगी से ही है।
मजबूरी हर इंसान को झुका देती है, कितना झुकना है वो उसकी मजबूरी पर निर्भर पड़ती है।
हमें जो दिखता है हम बस उसकी ही वाह-वाही करते हैं, लेकिन उसके पीछे छुपे लोगों और उनकी मेहनत किसी को नहीं दिखती।
कहने को साल दर साल यूं पलक झपते ही बीत जाते हैं, लेकिन किसी की याद व चाहत में एक पल गुजारना मुश्किल हो जाता है।
पीयूष मिश्रा के अल्फाज उन लोगों पर सूट करते हैं, जो मजबूरियों का नाम देकर अपने काम से पल्लू झाड़ लेते हैं।
भई इश्क और काम ऐसे दो जरूरी हिस्से हैं हमारी जिंदगी के, जिससे कोई अछूता नहीं रहा है। इश्क करके हमेशा बात बिगड़ती ही है, वहीं काम में हमेशा जान रगड़ती है।
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